प्यार या व्यपार

प्यार अब होने लगा व्यापार सा
अब कहाँ रहता है कुछ भी प्यार सा।।
इश्क़ गर हो जाए तो दिल में रखो
दोस्तों में मत करो अख़बार सा।।
कहने को दुनियाँ हमारी है सनम
अब कहाँ कोई मगर गमख़्वार सा।।
देख कर बच्चों की ख़ाली थालियाँ
बाप कितना हो रहा लाचार सा ।
दुश्मनों की क्या ज़रूरत है भला
हो जो दुश्मन ही हमारा यार सा ।।
हर बशर की है शिराओं में ज़हर
हो रहा जीना यहाँ दुश्वार सा ।।
छोड़ न,,,दुनियाँ से अब लेना ही क्या
बदला-बदला लग रहा व्यवहार सा ।।🥰
हो गई मुद्दत तुझे देखे सनम
देख आकर हो गया बीमार सा ।।
गुफ़्तगू करना तुम्हारा यकबयक
क्यूँ हमे लगने लगा इज़हार सा ।।
चाँद को हम रात भर तकते रहे
हो रहा था उनका यूँ दीदार सा ।।🥰
इन लबों की सुर्खियाँ हैं आपकी
हम पे है कुछ आपका अधिकार सा।।
कहते डरते हैं वो हमसे कुछ तो है
हाँ कभी लगता ,,,कभी इनकार सा ।।
क़त्ल के औज़ार सब मौजूद हैं
हुस्न तेरा तीर सा तलवार सा ।।
आपको बातें भी अब चुभने लगीं
फूल अब लगने लगा है खार सा ।।
ईंट के जंगल में “सन्दल” घर तो हैं
पर नहीं दिखता कोई परिवार सा ।।

The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *