*वेलेंटाइन डे लेखन प्रतियोगिता*
*विषय: प्रेम*
*प्रेम…*
ढाई अक्षर का शब्द…
लेकिन समर्पण, त्याग, दया, भाव
सबकुछ अपने अंदर समेटे हुए है ।
और इसी प्रेम के ख़ातिर ही तो हमारे कई जवान भी,
अपने देश के लिए तिरंगे में लिपटे हुए है ।
वैसे तो प्रेम के कई है रूप,
कभी छांव तो कभी धूप,
कभी रूपमय, कभी कुरूप,
कभी बोलबाला, कभी बहुत चुप,
कभी दरिद्र, कभी भूप,
कभी सागर, तो कभी कूप,
हर प्रेम में अपनी एक सीमा अपनी एक मर्यादा है ।
क्यूंकि हर संबंध में, एक प्रेम ही है जो कन्दा है ।
प्रेम….मीरा जैसा,
जो कृष्ण की एक झल़क को आकुल हैं ।
प्रेम…बजरंगी जैसा,
जो श्री राम के लिए हर पल व्याकुल हैं।
प्रेम…ब्रिजवासियों जैसा,
जो परमात्मा को भी सखा मानते हैं ।
प्रेम…कृष्ण जैसा,
जो उनके सखा प्रेम को सप्रेम अपनाते हैं ।
प्रेम बहुत कुछ सिखाता है,
प्रेम बहुत कुछ समझाता है,
प्रेम हर किसी से नहीं होता,
नियति ही हमें प्रेम से मिलवाता है ।
जो करे प्रेम वो प्रभु को भी पा जाता है,
और प्रेम में ही इंसान…
नामुमकिन को मुमकिन कर जाता है ।
तभी तो *श्री कबीर दास जी* ने भी कहा था…
पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
✍️अखिल त्रिखा…
