आज की कविता का शीर्षक है
प्रेम
लेखक प्रोफेसर संदीप गुप्ता की ✒️ से
प्रेम करो, प्रेम करो,
मस्त मगन होकर के प्रेम करो।
प्रेम बड़ा अनमोल है,
जिसका न दुनिया में कोई मोल है।
प्रेम से बड़ा न कोई शस्त्र है,
जो जीता जीवन की हर जंग है।
जिसमें होता न कोई स्वार्थ है,
बस वही प्रेम है जो निस्वार्थ है।
प्रेम शब्द ही पूर्ण है,
प्यार का तो पहला शब्द ही अधूरा है।
फिर हुआ, इश्क तो देखा इसका तो दूसरा शब्द अधूरा ही अधूरा है।
फिर करके देखी मोहब्बत इसका तो तीसरा शब्द अधूरा है
बस प्रेम शब्द ही पूर्ण है,
यही सत्य सबसे गहरा है।
प्रेम की भी अमर कहानी है,
मीरा का गिरधर से प्रेम
इसकी सबसे बड़ी निशानी है।
प्रेम न जाने कोई भाषा,
न समझे कोई रंग-रूप।
प्रेम में ऐसी सूक्ष्म होती एक डोर है,
जो हर पल खींचे अपनी ओर है।
कहता है कबीर—
प्रेम करो, प्रेम करो,
मस्त मगन होकर प्रेम करो।
प्रेम जगत की पूँजी है,
सफल जीवन का आधार प्रेम है।
जो बोएगा वही काटेगा,
बाटेगा प्रेम तो वही पाएगा।
जब दो मिलकर के होते एक हैं,
बस यही प्रेम की परिभाषा है।
ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ आपका बहुत-बहुत धन्यवाद🙏🙏
