प्रेम

……… प्रेम ………..

अगर प्रेम को
शब्दों में समेटना चाहे कोई
तो
महज़ ढाई आखर में समेट सकता है।

जो बात महसूस करने की होती है
उसे शब्दों में पिरोना
बहुत बहुत ही मुश्किल होता है

मैं अगर लिखने बैठूं
तो मैं कहूँगा की
मैं तुम्हें महसूस करना चाहता हूँ
महज़ लिखने के बजाय

पता है
आज मैंने तुम्हारा नाम लिखा
और फ़िर,
फ़िर
देर तक चूमता रहा उसे

मुझे तुम्हारा होना
यूँ महसूस होता है
बहुत पास

कभी कभी इतना पास
की मैं सुन सकता हूँ
तुम्हारी सांसों की सरगम
तुम्हारी धड़कन तक

ये सब जब महसूस हो रहा होता है
इस अहसास को शब्दों में ढालना
मुझे बेईमानी सा लगता है।

फ़रवरी अमूमन गर्म रहता है लेकिन
बीती रात
हल्की ओस आई है यहाँ
और मिट्टी महकने लगी है

खिड़की खोली तो
इक महक से भर गया कमरा
और महकने लगा है
हुबहू तुम्हारी महक सा

ये महक मुझे
तुम्हारा छुआ याद दिला रही है
हाँ वो पहली बार का छुआ
जब पहली बार तुमने मुझे छुआ था
दाएं हाथ की कलाई से थोड़ा ऊपर
हाँ वहाँ इक निशान छूट गया है
तुम्हारी उंगली के पोर का
वो सिर्फ़ मुझे महसूस होता है
और मुझे ही दिखता है बस

पता है प्रेम क्या है ?

तुम प्रेम हो
तुम्हारा होना प्रेम है
तुम्हारा छुआ प्रेम है
तुम्हारी महक प्रेम है
तुम्हारा अहसास प्रेम है
हाँ
जो भी महसूस हो रहा है
सब प्रेम है
हाँ
तुम प्रेम हो
और तुम्हारा होना प्रेम है।
ये जो भी घटित हो रहा है
सब प्रेम है।

…. मनीष सरिता(मां) कुमार

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