वतन की शान

नाम – चन्दन नाविक ‘विनम्र’
विषय – प्रेम (खुली कविता)

वतन से प्रेम करते हैं वतन पर जाँ लुटाते हैं,
फँसोगे उनके चंगुल में तो तुम किसको पुकारोगे,
कफ़न सर पर जो अपने बाँध कर घर से निकलते हैं,
वतन पर मर मिटे हैं जो तुम उनको क्या ही मारोगे,

हम उनकी ख़ुशियाँ उनसे छीन कर के मार ही देंगे,
हमारी माओं की ममता उजाड़ी है जिन्होंने भी,

हम उनके हाथ उनके बाजुओं से काट ही देंगे
हमारी बहनों की माँगें उजाड़ी है जिन्होंने भी,

तुम्हारे प्रेम की सौगंध खा कर के मैं कहता हूँ,
मिटा दूँगा मैं उन सबको मिटाया है जिन्होंने भी |

निगाहों में भरी है ज्वाला सी लपटे दहकती हैं,
भुजाएँ दुश्मनों का सर कलम करने बहकती हैं,
तुम्हारे प्रेम में सर्वस्व कर दूँगा मैं न्योछावर,
लगी है आग इस दिल में जो हर पल अब धधकती है

तुम्हारी शान में कोई कमी होने नहीं देंगे,
तुम्हारी राह में काँटों को हम बोने नहीं देंगे,
तुम्हारे एक इशारे पर हम अपना सर कटा देंगे,
मग़र आँचल को अब नीलाम हम होने नहीं देंगे

वतन के प्रेम में बलिदान देना ग़र पड़ा हमको,
हम अपनी जान भी कुर्बान उस पर हँस के कर देंगे,
वतन की शान पर उंगली उठाएगा अगर कोई,
कसम है माँ भवानी की कलम सर उसका कर देंगे |

जय हिंद 🫡🇮🇳🇮🇳🇮🇳

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