शोर से परे प्रेम

प्रेम केवल तुम्हारा हाथ थाम लेना नहीं,
यह अकेले में खुद को संभाल लेना भी है।
प्रेम केवल मुस्कानों का उत्सव नहीं,
यह भीगती पलकों का धैर्य भी है।
कभी यह धूप बनकर कंधों पर उतरता है,
कभी सर्द रातों सा चुपचाप ठहरता है।
प्रेम प्रतीक्षा की लंबी सीढ़ियाँ चढ़ता है,
और हर पायदान पर उम्मीद रखता है।
यह जुदाई में भी साथ निभाता है,
नाम नहीं लेता, पर याद बन जाता है।
कभी यह चुपचाप दुआ बन जाता है,
कभी किसी की आवाज़ में सुकून पाता है।
कभी यह खुद को माफ़ कर देना है,
आईने में अपने लिए ठहर जाना है।
प्रेम अधूरा होकर भी पूरा रहता है,
दूर होकर भी पास खड़ा रहता है।
यह शोर नहीं करता, बस बहता है,
रगों में जैसे कोई विश्वास रहता है।
प्रेम…
किसी एक दिन का मोहताज नहीं,
यह वह एहसास है—
जो हर धड़कन में वैलेंटाइन बना रहता है।

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