अवर्णनीय प्रेम का सौंदर्य
मेरी प्रेयसी हो अति सुन्दर जिसका वर्णन ना कर पाऊं।
कोशिश करके हौसले बुलंद लफ़्ज़ों से तुमको मैं गाऊं।
नैन कटीले नाज़ुक पलकें चितवन नजरों की बतलाऊं।
कोशिश करके हौसले बुलंद लफ़्ज़ों से तुमको मैं गाऊं।।
नीरज अधरों को देखूं गर मैं तो नील कुसुम चुन लाऊं।
रूप देखकर यारों उसका मै ख़ुद अपना होश गवाऊं।
मोहिनी रूप की धनी सेज में सुंदरता को बिख राऊं।
कोशिश करके हौसले बुलंद लफ़्ज़ों से तुमको मैं गाऊं।।
स्वर्णित आभा मुखमंडल छू लूँ तो वो कुम्हला जाए।
धवल चांदनी सी काया है और स्वर्ण भेद न कर पाए।
चंदा भी शरमा जाए उसकी यौवन्ता को दिख लाऊं।
कोशिश करके हौसले बुलंद लफ़्ज़ों से तुमको मैं गाऊं।।
पागल कर दे वो बिंदी देख के उसका सुन्दर चितवन।
कर्णफूल की शोभा अति प्यारी जैसे तपता है कुंदन।
बोले तो वो कोयल सी सुंदर वाणी मैं कहां से लाऊं।
कोशिश करके हौसले बुलंद लफ़्ज़ों से तुमको मैं गाऊं।।
गीत गाए तो फीके पड़ जाएं सातों स्वरों के सर गम।
हाथों में सजती हैं कांच की सुंदर वो चूड़ी खन खन।
कंगन की जोड़ी अति प्यारी जैसे मीठा मधु निकलाऊं।
कोशिश करके हौसले बुलंद लफ़्ज़ों से तुमको मैं गाऊं।।
काले मेघों की काली घटा में लहराती जुल्फें वो नागन।
घायल करती है मेरा वक्ष चलाती तीर वो अपने नैनन।
उसके सर से उड़ता दुपट्टा बासंती पुष्पों से सज वाऊं।
कोशिश करके हौसले बुलंद लफ़्ज़ों से तुमको मैं गाऊं।।
नृत्य करे तो झूमे करधन डोले ऊपर ये नभ-मंडल।
चाल चले वो अवनी पर पग-पग पैजनिया की धुन।
इसकी कोमलता में पागल “ऋतु” प्रेम मगन हो जाऊँ।
कोशिश करके हौसले बुलंद लफ़्ज़ों से तुमको मैं गाऊं।
गीतकार- रितेश कुमार “ऋतु”✍🏻
