प्रिय अमर शहीदों के परिवारजनों के नाम एक खुला पत्र ✍️

प्रिय अमर शहीदों के परिवारजनों के नाम एक खुला पत्र ✍️

यह पत्र, आदरणीय माताओं, पिताओं, पत्नियों, बहनों, बच्चों तथा उन सभी परिजनों के नाम, जिनकी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा हमेशा के लिए राष्ट्र को समर्पित हो गया—यह पत्र केवल शब्दों का संयोजन नहीं है, बल्कि उन भावनाओं की अभिव्यक्ति है, जिन्हें शब्दों में पिरोना आसान नहीं होता। कुछ तिथियाँ केवल कैलेंडर पर अंकित नहीं रहतीं, वे हमारे हृदय पर स्थायी रूप से अंकित हो जाती हैं। 14 फ़रवरी 2019, जिसे आज “ब्लैक डे” के रूप में याद किया जाता है, ऐसी ही एक तिथि है—जो हर वर्ष हमें एक साथ गर्व और शोक से भर देती है।

उस दिन देश ने पुलवामा के आत्मघाती हमले में अपने 40 ऐसे सपूतों को खो दिया, जिनके लिए वर्दी मात्र एक पहचान नहीं थी, बल्कि एक मौन संकल्प था—कि राष्ट्र की रक्षा हर परिस्थिति में सर्वोपरि रहेगी। हम जानते हैं कि उस दिन के बाद आपके घरों में समय आगे बढ़ता रहा, पर जीवन कहीं ठहर-सा गया। कुर्सियाँ खाली रह गईं, आवाज़ें स्मृतियों में बदल गईं और हर त्योहार पहले जैसा नहीं रह पाया। यह शून्य भले ही आपने अकेले महसूस किया हो, पर उसकी गूंज पूरे देश के मन में आज भी जीवित है।

एक माँ के लिए अपने बेटे की शहादत पर गर्व और वेदना को एक साथ संभालना असाधारण साहस की मांग करता है। एक पत्नी के लिए स्मृतियों से संवाद करना, एक बहन का भाई की कलाई की राखी बांधने का इंतज़ार और एक बच्चे के लिए “पिता” शब्द के अर्थ को जीवन भर ढोना—ये सभी ऐसे बलिदान हैं, जिनके सामने किसी भी श्रद्धांजलि के शब्द अपर्याप्त लगते हैं। हम यह दावा नहीं करते कि आपके दुःख को पूरी तरह समझ सकते हैं, क्योंकि कुछ पीड़ाएँ समझी नहीं जातीं, केवल सहन की जाती हैं। पर हम यह स्वीकार अवश्य करते हैं कि आपकी पीड़ा इस राष्ट्र की सामूहिक ज़िम्मेदारी है।

ये वे महान शहीद थे, जिन्होंने अपने व्यक्तिगत सपनों को अधूरा छोड़कर करोड़ों नागरिकों के सपनों की रक्षा की। उन्होंने अपने परिवार से दूर रहकर हमारे परिवारों को सुरक्षित रखा और अपने आज को अर्पित कर हमारे कल को सुरक्षित बनाया। यह पत्र केवल एक श्रद्धांजलि नहीं है, बल्कि एक कृतज्ञ स्वीकारोक्ति है कि जिस स्वतंत्रता और सुरक्षा में हम आज सांस लेते हैं, उसमें उनका अमूल्य योगदान समाहित है।

हम यह वचन देते हैं कि उनके बलिदान को केवल स्मरण-दिवसों तक सीमित नहीं रखेंगे। हम उनके नाम को अपने आचरण, अपनी ज़िम्मेदारियों और अपने नागरिक धर्म में जीवित रखेंगे। आज हम नतमस्तक होकर यह कहते हैं कि आपका त्याग व्यर्थ नहीं गया। आपके वीर अमर हैं और वे हर उस हृदय में जीवित हैं, जो इस तिरंगे को केवल एक ध्वज नहीं, बल्कि सम्मान, कर्तव्य और आत्मसम्मान का प्रतीक मानता है।

सदैव कृतज्ञ,
सुनील मौर्या
एक भारतीय नागरिक
जय हिंद 🇮🇳 | जय भारत 🇮🇳

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