कविता प्रतियोगिता : ७ सीरीज: १ विषय: ज्योत ( परिवर्तन का प्रतीक ) शीर्षक: रोशनी की अलख “ज्योत” मेरे मन के अंधकमल में रोशनी की अलख जगे , आत्मज्योति, जीवनज्योति, परमज्योति, अखंडज्योति सी छवि लगे । भारतीय जन मन जीवन व सनातन धर्म में समझें ज्योत की महत्ता रोशनी का प्रतीक है जो ,छलकती इसी से भव्यता। माता […]
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आग की तरह जलते सपने
कविता प्रतियोगिता – हुंकार विषय – आग की तरह जलते सपने तहज़ीब का दुप्पटा ओढ़ना अजनबी सिखाते खुद की नज़र बेटियों के प्रति काबू न कर पाते आग की तरह जलते सपने राख हो जाते हैं हम बेटियों के ख़्वाब, ख़्वाब ही रह जाते हैं… बेटियों को उड़ान भला कौन भरने देना चाहता हमारा अपना […]
डिजिटल भारत — पक्ष और विपक्ष
सीरीज 1 प्रतियोगिता 5 —————————— नाम : हुंकार प्रतियोगिता टॉपिक : डिजिटल भारत — पक्ष और विपक्ष राउंड : एकल रचयिता : सुनील मौर्या डिजिटल भारत — पक्ष और विपक्ष ——————————————- कभी खपरैल के नीचे बैठ, मैं मस्ती में, चाय की चुस्की लेता था, अब मोबाइल की स्क्रीन पर, किसी कविता को अंजाम देता हूँ। […]
Zindagi ki chupal
प्रतियोगिता ५ : ज़िंदगी एक चौपाल लगती थी चौपाल जब गाँव के बाहर, जहाँ बँटते थे दुख-सुख, होते थे विचार। ज़िंदगी भी कुछ वैसी ही मालूम होती है, मेरे-तेरे दिल की, बस एक सी बात होती है। कोई यहाँ बाँटता है ख़ुशी के पल, तो कोई रहता है दुखों में हर पल। कोई “अपना” बनकर […]
आग की तरह जलते सपने*
आग की तरह जलते सपने सपने… जिन्हें हमने अनगिनत रातों में सजाया, जिन पर हमने अपनी उम्मीदों का आंच दिया। वो सपने अब आग की तरह जलते हैं, हवा से नहीं, अपने इरादों की ताक़त से। हर जख्म, हर ठोकर ने उन्हें और भी प्रज्वलित किया, हर असफलता ने उन्हें और भी बुलंद बनाया। अब […]
Aatmsat
सीरीज 1 कविता प्रतियोगिता 4 —————————— नाम : शब्दों की माला प्रतियोगिता शीर्षक: आत्मज्ञान राउंड : एकल रचयिता : स्वाति सोनी युगों – युगों से बहती है ,जैसे गंगा की धारा नव भोर में सबसे पहला चमकता एक सितारा ऐतिहासिक खोह में खोजे नव परिवर्तन आत्मसात है आत्मजागृति,जिससे होता मंथन। निज पर शासन फिर अनुशासन […]
समय की परछाइयाँ
सीरीज 1 प्रतियोगिता 4 —————————— नाम : शब्दों की माला प्रतियोगिता टॉपिक : समय की परछाइयाँ राउंड : एकल रचयिता : सुनील मौर्या समय की परछाइयाँ ————————- कितना भी तुम कहीं भाग लो, ये परछाइयाँ साथ चलती हैं। वक्त की रेत पर लिखी लकीरें, इंसान को जीना सिखा देती हैं। कभी धूप बनकर चुभती है, […]
प्रकृति हमसे नाराज़ है
*विषय* – *प्रकृति हमसे नाराज़ है* चीख चीख कर कह रही दे रही आवाज़ है प्रकृति हमसे नाराज़ है हरियाली सारी नष्ट हुई न बचे पेड़ न डाल है समान साज सजावट का बनी पशु की खाल है शाखें वृक्षों से टूट रहीं नदियां बांधों से छूट रहीं देखो प्रकोप इस धरती का हर दिन […]
Prakrati humse naraz hai
विषय : प्रकृति हमसे नाराज़ है । शब्दों की माला : एकल राउंड जिसे कहा माँ उसकी ये दुर्दशा – कि, अपनी खुद कहानी लिखी व्यथा की, प्रकृति की पूजन का संदेश तो “श्री कृष्ण “ ने भी बतलाया, पूजा था गोवर्धन को— मान उसने भी पाया, फिर हम मनुष्य क्या प्रभु से भी ऊपर […]
सांस लेती जिंदा लाश
सांस लेती जिंदा लाश कभी धड़कते थे अरमान उसके सीने में, अब बस खामोशी का बसेरा है उसके चेहरे में। सपनों की वो मिठास, उम्मीदों की वो रोशनी, सब कहीं खो गई, पीछे छूट गई बस एक वीरानी। हर सुबह उठती है, पर आंखों में उजाले नहीं, हर शाम ढलती है, पर मुस्कान की चमक […]
