अधूरी मोहब्बत का मुकम्मल सफ़र(मुक्तकाव्य)

अधूरी मोहब्बत का मुकम्मल सफ़र।

बचपन के सफ़र आगाज़ में दो अजनबी ऐसे मिले,
उनके नयनों के चार होने से ख़्यालातों से दिल मिले।।

वक़्त मिला जब भी उनको आलम- ए- मोहब्बत का,
चाय के बहानें महफ़िल में तन्हाई तअल्लुकात का।।

विषम हालात में घर की बार- ए- जिम्मेदारी देखा है,
वालिद के साथ परिवारों के लिए जज़्बात देखा है।।

मौसम बौछारों के संग आंगन में वस्ल- ए- मिलन था,
दीदार- ए- हुस्न का हुआ पूछा जहन का सवाल था।।

जहाँ में न रहूँ अगर मैं तो तुम क्या जी पाओगे?
स्वाति की बूंद बिना पपीहा क्या पान पी पाओगे?

एक- दूसरे से अपनी इज़हार- ए- मोहब्बत कर दिया,
मुख से चन्द अल्फ़ाज़ जादुई शब्दों सा असर किया।।

रातों को नींद न आए इनको ख्वाबों के आसमान में,
प्रेम के ख़त पुराने जो रख तकिया के सिरहाने से।।

बीच इनकी मोहब्बत के दुनिया ज़माना आ गया,
एक- दूसरे की जुदाई काले षड्यंत्र का फसाना था।।

अश्कों के धारे से अंखियाँ की चमक चौंधी थीं,
यादों के सहारे में नींद निशा से भोर ठहरी थी।।

बदला कुछ भी नहीं रास्तों का सिलसिला वही था,
अलग होने की क़ीमत ग़लत फहमी ही फासला था।।

चेहरे की खामोशी से जज़्बात खुदबखुद बयाँ होते थे,
मुलाकातों के आलम में जो एक- दूसरे संग रोते थे।।

नेक ख़ुदा के बंदे ने दिखाया सच की तस्वीरों से,
मिलन हुआ दो रूहों से ढह गया झूठ दीवारों में।।

जहाँ में दो प्रेम जोड़ों की रहम-ए-ख़ुदा की बंदगी है,
परवाना अलग कैसे होगा शमा की वो जिन्दगी है।।

मिलकर लिया ख़ुद दोनों ने एक जीवन का फैसला,
सभी बाधाओं से लड़कर चलेगा इश्क़ का काफिला।।

इतिहास में लिख कर जायेंगे अपनी प्रेम कहानी से,
इश्क़ अधूरा नहीं यहाँ “ऋतु” कलम की ज़ुबानी से।।

~रितेश कुमार “ऋतु” ✍🏻

Updated: April 20, 2026 — 6:18 pm

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