दूरी का मुकम्मल होना

शीर्षक: दूरी का मुकम्मल होना
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भीड़ के शोर में अक्सर एक खामोशी पुकारती है,
किसी अजनबी की आँखों में अपनी दुनिया निहारती है।

ना इरादों ने जन्म लिया, ना लफ़्ज़ों ने कुछ कहा,
बस कुछ लम्हों की नर्मी ने दो दिलों को जोड़ दिया।

चाय की भाप में घुलती बातें, बारिश में ठहरते साये,
जो अल्फ़ाज़ कभी कहे ना गए, वो एहसास बनकर पास आए।

मोहब्बत यूँ आई चुपके से कि दिल भी समझ ना पाया,
और जब नाम देने की बारी आई, तब खुद को ही भुलाया।

हर कहानी मुकम्मल कहाँ होती है, कुछ मोड़ हालात लिख जाते हैं,
जहाँ डर, रस्में और दीवारें, दो चाहतों को रोक जाते हैं।

बिना सवाल, बिना सफाई, एक साज़िश से फैसला सुनाया गया,
और खामोशी की उस सज़ा में हर सपना बिखराया गया।

वो अलग हुए मगर इस बार कमज़ोरी से नहीं, समझ से,
खुद को बनाने की ठानी, अपनी धुन अपनी ही गरज से।

कुछ ख्वाब अधूरे रहकर भी रूह में ऐसे बस जाते हैं,
कुछ नाम बिना लिए ही दिल में धड़कते रह जाते हैं।

वक्त की धूप में जलकर जज़्बात कभी नहीं मरते है,
सच्चे रिश्ते दूर रहकर भी एक दूसरे की फिक्र करते है।

कहते हैं अगर सच्ची है चाहत, तो वक्त भी झुक जाएगा,
और अगर राहें ना भी मिलीं, तो भी दिल मुस्कुराएगा।

क्योंकि कुछ रिश्ते साथ नहीं, फासलों में मुकम्मल होते हैं,
जो बिछड़कर भी ना बिखरें, वही सच में मोहब्बत होते हैं।

तब दोनों को समझ आया—
हर साथ मुकम्मल नहीं होता, और हर जुदाई अधूरी नहीं होती,
जिन रिश्तों में दूरी रह जाए, मिलने की ख्वाइश कभी पूरी नहीं होती l

रचयिता— सुनील मौर्य

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