कलम बनाम तलवार

कलम बनाम तलवार

कि तुम बना दोगे गर मुझे अपना दुश्मन
टूट कर बिखर जायेंगे तुम्हारे तमाम ख्वाब
विजयी पताका लहराने के खातिर हरदम
खेल डाली मैने खून की होली हजारों साल।

अतीत के पन्नों को आओ पलटें फिर इक दफा
पृथ्वीराज का शौर्य किसी शेर की भांति गरजा था
हाथों में तलवार लिए वीर अभिमन्यू की क्या बात करें
चक्रवयूह में फंस कर भी तलवार लिये रण लड़ता रहा

मुझसे है इतिहास पुराना सदियों सदियों का साथ है
वीरों की इस वीर धरा ने थामा पग-पग पे मेरा हाथ है
शौर्य गाथा आज सुने तो लहू में भरता उबाल है
विरासत के परकोटे में आज भी होती मेरी बात है

मैं “कलम” मुझमें मेरी ही एक अलग दुनिया समाई है
मैं लिखती हूं मुसलसल क्यूंकि जिंदगी मेरी स्याही है
कोरे पन्नों पे चलती मैं और लिखे जाते हैं मुझसे कईं बयान
एक दस्तखत पे होते फैसले और जारी किये जाते नये फरमान

मेरी ताकत का कोई अंत नहीं है जनाब
छोटी हूं मगर लिये जाते मेरे द्वारा फैसले बेहिसाब
अमिट हूं और बन जाती हूं आखिरी मोहर कईं गुनाहों की
टूट जाती मैं अंत में मगर तकदीर भी लिख जाती बेगुनाहों की

तलवार भी आज तुच्छ है मेरे आगे
क्यूंकि मैं शब्दों के बाण चलाती हूं
बिना किसी अस्त्र या शस्त्र के सहारे
मैं देश की सरकार बनाती हूं

मैं वो हथियार हूं
जिसे हर कोई अपनाता है
कोई अपनी जिंदगी बनाता है
तो कोई अपनी “शब्दों की दुनिया” बसाता है

मैं कलम हूं जनाब
मुझमें छिपे कईं किरदार है
किसी लेखक का प्यार हूं
तो कहीं किसी शायर का ताज हूं

गौरव सोनी
(शब्दों की दुनिया)

Updated: August 26, 2025 — 7:27 am

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