**एक पत्र उन परिवारजनों के नाम, जिन्होंने अपनों को खोया है…** पुलवामा हमले में शहीद हुए उन 40 वीर जवानों की स्मृति में, एक विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते है। प्रिय परिवारजनों, शब्द अक्सर छोटे पड़ जाते हैं, जब दर्द बहुत गहरा होता है। फिर भी आज यह पत्र लिखते हुए दिल बस यही कहना चाहता […]
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“प्रेम” (प्रेम की गहराई)
*वैलेंटाइन डे लेखन प्रतियोगिता 2026* *विषय – ” प्रेम “( प्रेम की गहराई )* ये प्रेम कोई पल भर का अफ़साना नहीं, ये उम्र भर साथ निभाने का बहाना नहीं, ये वो बंधन है जो रूहों को जोड़ता है, हर जन्म में एक-दूजे की ओर मोड़ता है। प्रेम सिर्फ़ शब्द नहीं, एहसास पुराना है, रूह […]
मर्यादित कौन
प्रतियोगिता – सीरीज़ 1, राउंड 1 विषय: मर्यादित कौन भाव: सामाजिक मर्यादा, सच्चाई और अन्याय पर प्रहार रावण को क्यों जलाते हैं, आज तक समझ आया नहीं,बुराई तो इंसान में है, रावण को फिर जलाने से हर बार रोका क्यों नहीं… हर साल पुतला जलता है, पर भीतर का रावण मुस्काता है, झूठ, घमंड, लालच […]
“वो महकते हुए से ख़त”
प्रतियोगिता : “दिल से दिल तक” विषय : “वो महकते हुए से ख़त” वो महकते हुए से ख़त तुम्हारे जब जब आते थे घर हमारे, दिल की धड़कन बढ़ जाती थी देख उन्हें मेरी ख़ुशी के मारे। जब आता डाकिया लेके ख़त बेताबी सी बढ़ जाती थी दिल के द्वारे, जैसे कि बंद लिफ़ाफे से […]
नेता बदलते है, नियत नहीं
विषय – नेता बदलते है, नियत नहीं बेख़ौफ़,आज़ाद मैं अपनी हर बात रखूंगी, झूठ की दीवारों पे अब सच की सौगात रखूंगी, भारत की नारी मैं,अब हर सवाल से दो-चार करूंगी, सिंहासन बैठे राजा बन,उनकी नियत का व्यापार करूंगी। सियासत की गलियों मे जो छल का बाज़ार करते है, हर बार नया चेहरा लाकर खेल […]
“ख़ुद से संवाद”
“ख़ुद से संवाद” थक गई थी हर रोज़ खुद को समझाने में, झूठी हँसी चेहरे पर सजाने में। हर सवाल से खुद को बचाती रही, भीतर की आहट को चुप कराती रही। दुनिया को दिखाया मजबूत सा चेहरा, पर अंदर से बिखरा था हर सवेरा। सब ठीक है ये रोज़ कहती रही, मगर सच्चाई से […]
खुद से संवाद
आईने से बात आईने में झाँका तो खुद से सवाल किया, “क्या अब भी वही हूँ, जो कल था जिया?” चेहरे पर हँसी, पर आँखों में शाम है, कहीं तो दिल में भीगी हुई कोई बात थाम है। “क्यों थक गए हो?”, आईना बोला चुपके से, “खुद से भागते हो क्यों हर सुबह के साये […]
गरीब
अजनबी अपने ही घर में
विषय- “अजनबी अपने ही घर में ” चेहरे पे नक़ाब की चादर लिपटी हैं, जब आईने में नजर खुद से मिलती हैं, बिन कहे पलकों से बारिश गिरती हैं, कोई देख न ले…इसलिए अधरों पे मुस्कान होती हैं। यूँ तो चारों ओर से घिरी हुई हूँ, अपनो की इस भिड़ में फिर भी अकेली हूँ… […]


