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दरख्त

कितने स्वार्थी और मतलबी हैं ये मानव, दो गज जमीन के लिए अपनों से भी लड़ जाते हैं। वो भला मेरी पीड़ा क्या समझेंगे, जो निजस्वार्थ के लिए हमें नष्ट कर जाते हैं। कभी मेरी छाँव में बैठ अपनी थकान मिटाते थे, वहीं आज घरों में कूलर-पंखा चला, बड़े ठाठ से रहते हैं। हो रहा […]

दरख़्त

दरख़्त जैसे रिश्ते थे, हर शाख़ में बहार, अब हर सदा में तन्हाई है, दिल में है गुबार। एक दरख़्त की छाँव में, मिलते थे सब सबा, अब हर कोई जुदा है, बस हैसियत का ख़ुमार। जड़ें थीं जो मोहब्बत की, अब सूखती सी लगें, रिश्तों की नमी ग़ायब, दिल भी है ख़स्ता-ए-कार। माँ-बाप की […]