प्रतियोगिता : कहानी से अहसास
दिल ए हाल मुझसे,पूछ ना सवाल कोई,
एक शख्श पे ठहरा, मेरा जाने ना हाल कोई…
पहली दफ़ा देखा, लगा मुझे मुराद कोई,
रफ़्ता रफ्ता घऱ किया,जैसे था मकान कोई…
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आँखों में हसरते थी,पूछें जो सवाल कोई,
इश्क़ रास्ते पे चल पड़े, मंजिल जाने ना कोई…
मिलकर बैठे,खो गये जैसे चाँद-चकोर कोई,
रूहानी इश्क़ क्या चाहे, जाने ना यहां कोई…
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दीदार ए महबूब, जैसे चढ़े है इश्क़ रंग कोई,
आये है मजा,हया,जब ऐसी बातें करे है कोई…
रातों में नींद नहीं, चलता रहता है चेहरा कोई,
जुनून-ए इश्क़ की हद,भला यहां जाने ना कोई…
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इश्क़ बामुताबिक कब चलता है बातये कोई,
यूँही हमसफ़र मिल जाये,तों मजा कहाँ कोई…
विरह तों असल में, प्रेम को परिपूर्ण करता है,
दो दिल मिले, बताओ समाज क्यों जलता है…
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समाज का डर,और पाबंदियों से कैसे बचे कोई,
अपने घोले ज़हर,और गलतफहमी डाले कोई…
ना चाहते हुऐ भी, यूँ जुदाई घऱ करने लगती है,
बसबसा हम देखते रहते, यूँही जिंदगी चलती है…
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तन्हाई खाती और बेबसी फिर चीखने लगती है,
हिज्र-रात नहीं निकलती, जाँ निकली लगती है…
मा’मूल सा हाल,और आरिज पे नदियाँ बहती है,
तुम्हे पता नहीं, कस्तियाँ कितनी डूबी मिलती है…
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पर रूहानी इश्क़ भला कहाँ, किसी से छुपता है,
जंजीरों में बँध कर भी, इश्क़ उमदा चमकता है…
कबीर उससे फिर से मिलना,किस्मत में लिखा है,
मैं पतंगा सा, और वो लौ की तरह मुझे खींचता है…
~kabir pankaj
