शीर्षक:
” फ़ासलों में मुकम्मल मोहब्बत ”
भीड़ में वो अजनबी सा चेहरा, रूह में समा गया,
सादा लिबास, सादगी उसकी, दिल का चैन ले गया।
न कोई अमीरी का नशा था, न ही कोई गुमान था,
दो ख़्वाबों के परिंदों का, अपना एक आसमान था।
चाय की उन चुस्कियों में, ज़िक्र होता था वफ़ा का,
लाइब्रेरी की ख़ामोशी में, शोर था एक दुआ का।
बारिश की उन बूंदों ने जब, भिगोया था बदन को,
थमा था हाथ उसने, और सौंप दिया था मन को।
मगर नसीब की लकीरें, ग़ुरबत से उलझी हुई थीं,
दहलीज़ें समाज की, नफ़रतों से सुलगी हुई थीं।
मोहब्बत की मासूमियत को, साज़िशों का ग्रहण लगा,
अपनों की बिछाई बिसात पर, दिलों में वहम जगा।
एक झूठे से संदेश ने, दो जानों को जुदा किया,
बिना सवाल, बिना जवाब, ख़ुद को फ़ना किया।
वो कॉलेज की राहें, अब भी वही गवाही देती थीं,
मगर धड़कनें एक-दूसरे से, दूरी की सजा लेती थीं।
जब सच का पर्दा उठा, और बेगुनाही सामने आई,
आँखों की नमी ने फिर, बीती यादों की शम्मा जलाई।
उसी छत पर मिले दोनों, जहाँ इकरार हुआ था,
जहाँ तक़दीर की मार से, गहरा वार हुआ था।
समझ लिया था उन्होंने, कि सिर्फ़ लड़ना काफी नहीं,
मज़बूर हालातों में, सिर्फ़ सिसकना काफी नहीं।
दुनिया के डर से नहीं, अब ख़ुद के लिए संवरना है,
मुकम्मल होने की ख़ातिर, कुछ वक़्त जुदा रहना है।
गर मिले मुक़द्दर में तो, एक दिन ज़रूर मिलेंगे हम,
वरना इस पाक जुदाई में भी, कभी न होंगे फासले कम।
ज़रूरी नहीं कि हर कहानी, मकाम पर ही दम तोड़े,
कुछ अधूरी दास्ताँ भी, रूह से रिश्ता नहीं छोड़ें।
ये इश्क़ की वो मंज़िल है, जो रस्मों से परे रहती है,
दूर रहकर भी ये मोहब्बत, पूरी दुनिया से बड़ी लगती है। …..
आशुतोष राजौरिया
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