अधूरी मोहब्बत या पूरी ……??
वो अहसास वो ज़ज़्बात ,वो बात नज़रों की ,
बस एक नज़र में हुई ,मुलाकात नजरों की,
देखते ही देखते , एक फ़साना बयाँ हो गया,
कुछ कर ना पाए हम ,एक हसीन गुनाह हो गया,
मेरी इबादत ,मेरी बन्दगी ,यार मेरा ख़ुदा हो गया,
आबाद हुए ऐसे , कि ये दिल तबाह हो गया,
ये तिश्नगी थी ऐसी ,चन्द मुलाकातों से क्या बुझती,
उन्हें ज़िन्दगी में पाकर ही ,महफ़िलें दिल की सजती,
छोड़कर आवारगी ,दिल इश्क़-ए-राह पर चल निकला
शीरी सा गुनाह-ए-इश्क़ था,फ़रहाद की तरह बह निकला,
वो लम्हे जो ठहर न पाए, फिर भी उम्र भर ठहरे हैं,
कुछ रिश्ते नाम न पाकर भी, दिल के अंदर गहरे हैं,
वक़्त की धूप में जलकर भी, ये चाहत ठंडी नहीं हुई,
दूरियों की आँधी आई, पर ये डोर कमजोर नहीं हुई।
कभी दुआओं में उनका जिक्र, कभी खामोशी में उनका नाम,
हर एक सिसकी कह जाती है, अधूरा सा कोई पैगाम,
मिलना किस्मत में था शायद, पर साथ लिखा नहीं गया,
कहानी तो शुरू हुई थी, शायद अंजाम लिखा नहीं गया ,
वो आज भी कहीं मुस्कुराते होंगे, अपने नए जहाँ में,
और हम अब भी उन्हें ढूंढते हैं,उसी पुराने आसमाँ में,
मगर अजीब है ये मोहब्बत, हार कर भी जीत जाती है,
न मिलकर भी ये रूहों को, एक डोर में बांध जाती है,
तो क्या कहें इसे अधूरी, जब एहसास अब भी जिंदा है,
या पूरी मान लें इसे, जब दिल आज भी उन्हीं पर फिदा है,
शायद मोहब्बत का मतलब, साथ होना ही नहीं होता,
जो रूह में बस जाए एक बार, वो कभी जुदा नहीं होता।।
-पूनम आत्रेय
