इश्क़

बहुत दिन बाद मेरे दिल में खुली इक पुरानी सी किताब।
जिसमें ज़िक्र है बीती उम्र का और हैं कुछ पुराने से हिसाब।

हम मिले थे पहली पहली रोज़, वो कॉलेज के बगल वाली सड़क पर।
मौसम ने इशारा दिया, वो तेज़ बिजली सी कड़क कर।

तुम थोड़ी डरी और थोड़ी सहम गई।
आकर के मेरे बिल्कुल पास ठहर गई।

पूछा तुम भी यहीं पढ़ते हो और बताओ कहाँ से आते हो।
वैसे बताओ इस रास्ते पर आगे कहाँ तक जाते हो।

प्रेम का ये पहला पर्चा था, जो मैंने पहली पहली बार भरा था।
दिल धड़क के बाहर ना आ जाए, इसीलिए हाथ दिल पर धरा था।

दिल पागलों की तरह धड़कना जानता है।
कोई जब थामे हाथ तो मोहब्बत का इशारा मानता है।

हमने थामे रखा हाथ, वो तुम्हारे बस स्टॉप के आने तक।
फ़िर घंटों करी हैं बातें, वो रात से दिन हो जाने तक।

वो घर पर हमारे बारे में पता चलना
फ़िर दिन रात आंसु पर आंसू निकलना

वो सब एक दौर था और अब हम, वो सब याद कर हंसा करते हैं।
तुम गले लगाकर कहती हो, जब इश्क़ हो तो लड़ा करते हैं।

है बहुत ज़रूरी हिम्मत और होना भरपूर इश्क़ भी।
फ़िर निभा देगा कांटों पर चलने का दस्तूर इश्क़ भी।

इश्क़ में बगावत और जंग ज़रूरी है।
इश्क़ दो लोगों के बीच की धुरी है।

अगर निभा सको तब ही किसी का हाथ थामना।
नहीं तो मुक्त रहना, ना किसी को बंधन में बांधना।

….. मनीष सरिता(माँ) कुमार

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