“साज़िशों के बीच सच्ची मोहब्बत”
सदियों से मोहब्बत को सहनी पड़ी है साज़िश हर बार,
कभी अपनों ने धोखा दिया तो कभी ज़माने ने किया वार।
मोहब्बत का गुनाह था इतना वो कर बैठी थी एतबार,
ज़ालिम दुनिया देख ना पाई उजड़ गया घर बार।
मोहब्बत की मासूमियत ने हर बार सहे हैं अत्याचार,
मोहब्बत करने वालों ने सीखा नहीं प्यार में व्यापार।
ना ऊॅंच नीच ना अमीरी ग़रीबी देखता नहीं ये प्यार,
इनकी ख़ुशी तो बस इक दूजे को करना स्वीकार।
मोहब्बत साज़िश का जब जब भी हुई कभी शिकार,
सबसे नज़दीकी रिश्तों से भी उठ गया एतबार।
चालाकियाॅं सीखी नहीं मासूमियत ने जब जब किया इज़हार,
बस षड्यंत्र रचने वालों ने ना छोड़ी कसर कोई हर बार।
जिसे निभाना हो दिल से वो अपनी आत्मा से ज़रा पूछे तो इक बार,
क्या उसे ज़माने की बातों पर कभी करना चाहिए एतबार?
कानों सुनी और आंखों देखी सभी बातों को करके दरकिनार,
अपनी मोहब्बत को इक मौका तो ज़रूर देना तुम यार।
कहीं बाद में पड़े ना तुमको फ़िर पछताना उजड़ जाए घर बार,
रिश्ते निभाना ही है दिलों से तो फ़िर सीख करना एतबार।
अगर फ़िर भी हो कोई जीवन में ऐसी मजबूरी ना होना शर्मसार,
तुमने तो अपनी तरफ़ से की थी मोहब्बत पाक और उत्तम व्यवहार।
शायद उस जन्म में मुमकिन नहीं था साथ रहना इस बार,
मगर मोहब्बत कभी अधूरी नहीं होती इसमें बसता है परवरदिगार।
दूर रहकर भी तुम उसका भला सोच सकते हो देकर दुआएँ हज़ार,
मोहब्बत एक दूसरे को हासिल कर लेना ही नहीं होता हर बार।
स्वरचित ✍️
ममता शर्मा।
