Topic – अधूरी मोहब्बत… या पूरी
भीड़ में शुरू हुई थी एक ख़ामोश सी दास्ताँ,
नज़रो ने लिखा था जहाँ दिल का पहला फ़रमान।
ना दौलत थी पास, ना किस्मत का कोई सहारा,
बस दो सच्चे दिलो ने एक-दूजे को पुकारा।
कभी चाय के प्यालो में सपने उतर आते थे,
कभी नोट्स के बहाने जज़्बात बिखर जाते थे।
बारिश की छत पर जब इज़हार हुआ था,
उस दिन मोहब्बत का मौसम पहली बार हुआ था।
मगर रिश्तों की दुनिया ने दीवारें खड़ी कर दीं,
औकात, समाज, डर ने साँसे बड़ी कर दीं।
झूठे पैग़ामो ने सच को दफ़्न कर दिया,
दो मासूम दिलों को तन्हा सफ़र दिया।
वो रोज़ एक-दूजे से बिन बोले गुजरते रहे,
अंदर से टूटे मगर चेहरो से सँवरते रहे।
ना शिकवा किया, ना सवालों का दर खोला,
बस दर्द ने चुप रहकर हर रिश्ता तोला।
फिर सच ने एक दिन नक़ाब हटाया,
जिन्होंने तोड़ा था, वही चेहरा सामने आया।
दोनों मिले फिर उसी छत की पनाहो में,
आँसू भी थे शामिल उनकी निगाहो में।
समझे कि मोहब्बत हारती नही ज़माने से,
हार जाती है अक्सर अपनो के बहाने से।
फिर ठाना पहले खुद को बनाना होगा,
वक़्त से पहले कहां कोई ठिकाना होगा।
वो बिछड़े मगर इस बार टूटकर नहीं,
वक्त से हारे थे, मोहब्बत से नहीं।
कुछ रिश्ते हाथों की लकीरों में नहीं होते,
दूर रहकर भी कई लोग अधूरे नहीं होते।
अगर फिर मिलें तो किस्मत का करम होगा,
ना मिले तो भी ‘सहर’, इश्क़ कम न होगा।
– *स्वीटी कुमारी सहर*
