विषय – अजनबी अपने ही घर में जाने कहाँ गए वो दिन , जब मकान नही घर होते थे, दिलों में प्रेम था , दिन एक दूसरे के दिल में बसर होते थे, परिवार के सहारे , लोग अपने हर मुकाम तक आ जाते थे, पाकर सहारा एकदूजे का ,हर मंजिल को पा जाते थे, […]
Category: Hindi kavita
अजनबी अपने ही घर में
अजनबी अपने ही घर में बने बैठे हैं सब फुर्सत नहीं कि अपनों का हाल तक जाने जिसने पाला पोसा अपनी जिंदगी वार दी उसी को अपने घर में अजनबी हैं वो माने साथ बैठ दो पल बिताने की फुर्सत नहीं पैसे को ही अब सबसे बड़ा रिश्ता हैं माने अजनबी हुए जब खुद को […]
अजनबी अपने ही घर में
बैठे कहीं कोने में , सिमटकर अपने ही मन में, न बोला गया कुछ भी, है कैसी शांति जीवन में, चल रहा है न जाने क्या नहीं अन्दर, मगर फिर क्यों अजनबी हैं अपने ही घर में ….? सोचना है पड़ रहा कुछ कहने से पहले , वो मां – बाप हैं फिर भी बैठे […]
अजनबी अपने ही घर में
*अजनबी अपने ही घर में* जब तक जेब में पैसा रहा, मैं घर की शान हुआ करता था। आज हालात क्या बदल गए, अपने ही अजनबी में बदल गए। लोगों की आवाज़ बहुत काटती है, बददुआएँ भी साथ चलती हैं। फिर भी चुप हूँ, अपने काम में, शामिल हूँ ख़ुद इस अंजाम में। दर्द है […]
अजनबी अपने ही घर में
कभी की जिन दीवारों से बात, आज वो भी लगती हैं अनजान। जहाँ हँसी गूंजा करती थी, अब बस खामोशी का है सामान। क्या आज मुझसे है सभी परेशान, “अजनबी अपने ही घर में” क्यों में बन गई एक अजनबी मेहमान? अपनों की मुस्कानें जो कभी खिलती थीं, अब वो फीकी और बेमन सी लगती […]
Mazdoor
बचा लो इंसानियत वरना कुछ न बचेगा
विषय – बचा लो इंसानियत वरना कुछ न बचेगा कोने में पड़ी खाट उस पर बीमार बाप हैं मां फ़ुख रही चूल्हा अंदर करुण विलाप हैं बेटे बहू का चल रहा नित नृत्य का प्रोग्राम हैं देख दशा ऐसी विधाता भी खुद परेशान हैं पोता सोच रहा कि कब ये दुर्व्यवहार मिटेगा प्रभु बचा लो […]
दरख्त
दरख़्त
कुछ इस क़दर खड़ा हूँ मैं, कि खुशियाँ देने चला हूँ मैं, कुछ नहीं मेरा अपना जग में, बस, खुद में मस्त हूँ, दरख़्त हूँ। जब तक ज़िंदा रहा, जीवन दिया, अपनी पत्तियों के साथ, उपवन दिया, काट ही दोगे तो क्या कहूंगा ख़ुद से, बस इतना कि पस्त हूँ, दरख़्त हूँ। ना धूप से […]
मझधार में दरख़्त
“मेरी आवाज़ , मेरी पहेचान ” शीर्षक: मझधार में दरख़्त कभी थी मैं — एक दरख़्त साया-दिल, जिसकी शाख़ों में ख़्वाब झूला करते थे, जहाँ हर पत्ता एक दुआ की सदा था, हर तना — वक़्त का खामोश गवाह था। ज़मीं की गोद में मैंने रिश्तों की जड़ें बोई थीं, बच्चों की हँसी से हर […]


