प्रतियोगिता “स्वतंत्रता स्वर” विषय “कोई स्वतंत्रता सेनानी” Genre पत्र प्रिय बापू, आपको मेरा कोटि-कोटि नमन, मुझे नहीं पता कि यह पत्र मैं गर्व से लिख रही हूँ या शर्म से। शायद दोनों भाव ही मेरे मन में इस समय हैं। आप और आपके जैसे कई स्वतंत्रता सेनानियों ने जिस भारत का सपना देखा था, क्या […]
माँ भारती के नाम
शीर्षक – माँ भारती के नाम प्रिय माँ भारती, चलो वीरता और साहस लिखते हैं आज हम, लिखते हैं गाथा शहीदों की अपने लहू से हम, ज़ज्बा जिनका कम ना हुआ कभी लड़ते-लड़ते, मर मिटे जो हँसते-हँसते मातृभूमि की बलिवेदी पर। त्याग की बूंदों से सिंचा है आज़ादी का वृक्ष, शौर्य की कहानियाँ हर शाख […]
माँ भारती के नाम ख़त
माँ भारती, तुम्हें नमन 🙏 मैं तुम्हारे चरणों में शीश झुकाकर प्रणाम करती हूँ। आज मैं तुम्हें देश की वर्तमान परिस्थिति से अवगत कराना चाहती हूँ— देखो, किस प्रकार आज का युवा, हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के अद्वितीय बलिदानों को भुलाने पर उतारू है। हमारे युवा स्वतंत्रता सेनानी — चन्द्रशेखर आज़ाद, शहीद भगत सिंह, उधम सिंह, […]
ख़्वाहिशें
प्रतियोगिता – काव्य के आदर्श विषय – ख़्वाहिशें रचयिता – सुनील मौर्य प्रेरणा – मुंशी प्रेमचंद जी प्रयास – भाषा में गाँव की बोली का उपयोग प्रस्तावना: गाँव की धूल, चूल्हे की आँच, और सपनों की महक —यहीं से जन्म लेती हैं, सच्ची ख़्वाहिशें.. चरण – फाइनल ख़्वाहिशें: मिट्टी में पलते, सपनों की कहानी.. फटे […]
ख्वाहिशें
ख्वाहिशें कभी मिट्टी में खुशबू टटोलने की ख्वाहिश थी, कभी माँ के आँचल में छुप जाने की ख्वाहिश थी। कभी किताबों के पन्नों में खो जाने का मन था, कभी प्रेमचंद के गाँव में जीने का सपना बना था। कभी शब्दों से ही भूख मिटाने का इरादा था, कभी आँसू को कविता में बदलने का […]
ख्वाहिशें
ख्वाहिशें कभी मिट्टी में खुशबू टटोलने की ख्वाहिश थी, कभी माँ के आँचल में छुप जाने की ख्वाहिश थी। कभी किताबों के पन्नों में खो जाने का मन था, कभी प्रेमचंद के गाँव में जीने का सपना बना था। कभी शब्दों से ही भूख मिटाने का इरादा था, कभी आँसू को कविता में बदलने का […]
ख़्वाहिशे
प्रतियोगिता – काव्य के आदर्श विषय – ख्वाहिशें ज़िन्दगी गुज़रती रही और ख़्वाब कुचलते रहे, ख्वाहिशें क्या बदली ,थोड़े हम भी बदलते रहे, क्या बात उन ख़्वाबों की करे, जो दिल मे दफ़न हो गए, वक़्त के थपेड़े ही ,उन ख़्वाबों के कफ़न हो गए, जब ज़िम्मेदारियाँ सर पर पड़ी ,सब ख़्वाब हवा हो गए, […]
ख्वाहिशें
*ख्वाहिशें* कभी ये रूठे , तो कभी मनाने आती है, दूर जाकर तो कमी महसूस कराती है। ये ख़्वाहिशें भी अजीब सी मलिका हैं, दिल के दरबार में कोई तानाशाहिका हैं। कभी ख्वाबों को ये सोने नहीं देती, और कभी उम्मीदों में रंग भर देती। साथ हो ये तो मौसम भी मुस्कुराता है, ना हो […]
विषय : सखी,वो कह कर जाते…
विषय : सखी,वो कह कर जाते… दिल ए मकां सुना,ख़्वाब सताते हैं बेचैनी का घर,मेरा पता बताते है… किस ओर ढूंढू, हर राह टकती है, तुम चले गए,कोई पहेली लगती है… .. दर्पण से मेरी बातें,रातें काली है, चुप्पीयाँ चीखती, तुझे पुकारती हैं… दिन प्रतिदिन ओर टूटती जाती मैं, अच्छा होता,सखी,वो कह कर जाते… .. […]
सखी, वो कह कर जाते
प्रतियोगिता – काव्य के आदर्श विषय – सखी, वो कह कर जाते रचयिता – सुनील मौर्य चरण – सेमी फाइनल सखी, वो कह कर जाते —————————- सखी, वो कह कर जाते, लौटेंगे फिर सावन में, सूनी आँखें हैं भर जातीं, यादों के उस बंधन में। द्वार खुला था सारा दिन, राहों पर नयन टिकाये, साँझ […]
