केज
सखी वो कह कर जाते…
सखी वो कह कर जाते… सखी, वो कह कर जाते, बस एक बार मुड़ कर मुस्कुरा ही जाते। मैंने तो हर बार उन्हें अपनी खामोशी में पुकारा, पर वो हर बार जैसे दूरियों में और खोते गए। ना कोई अलविदा, ना कोई वजह बताई, बस निगाहें झुकी और यादें रह गईं। मैं वहीं बैठी थी […]
सखी वो कह कर जाते
*सखी, वो कह कर जाते* (दो सखियों के बीच संवाद) व्याह रचाया और फिर सखी, छोड़ दिया, सुहाग ने ज़िंदगी को कैसा मोड़ दिया। मैं तो नहीं रोकती, गर उनको जाना ही था, वो ही एक थे जिनको अपना माना था। क्या हुआ कि मैं आधुनिक नहीं हूँ बताओ, क्या है मेरी सौत में? मुझे […]
सखी, वो कह कर जाते
सखी, वो कह कर जाते… सखी, वो कह कर जाते, फिर मिलने का वादा वो करते। दिल में सपनों की लौ वो जलाते, पर दूर कहीं अचानक वो खो जाते। सखी, वो चुपके से मुस्कुराते, बातों में अपनापन वो लाते। यादों के मोती दिल में वो बोते, पर हमें अकेला वो छोड़ जाते। सखी, वो […]
वो तोड़ती पत्थर
विषय:- “वो तोड़ती पत्थर” जब बात बच्चों की *परवरिश* पर आ जाती है, तो *अकेली माँ* हर परिस्थिति में ढाल बन जाती है, ना कोई धूप-छांव से उसका वास्ता, ना कोई भूख-प्यास के लिए खुद की चिंता।। छोड़ दिया उस पति ने अपने पत्नी को “*अस्पताल में अकेला*”, क्यों? क्योंकि! जब उसको पता लगा उनकी […]
वो तोड़ती पत्थर
🪒 वो तोड़ती पत्थर🪒 धूप की मार सहती थी, फिर भी कभी न हारी, छांव मिली नहीं जीवन में, पर उम्मीद थी सारी। पत्थरों से भिड़ जाती थी, जैसे कोई जंग लड़ती, हर चोट पे मुस्काती थी, जैसे खुद को परखती। गोद में बच्चा भूखा था, पर रोटी नहीं थी पास, आँखों में नींद नहीं […]
वो तोड़ती पत्थर
प्रतियोगिता : काव्य के आदर्श विषय : वो तोड़ती पत्थर जिम्मेदारीयाँ घर की उसने उठा रखी है, वो तोड़ती पत्थर,दो निवाला कमाती है… .. हाथों में छाले,वो सारी रात कराहती है, दो बच्चे हैं, बस उन्हें देख मुस्कुराती है… .. सूरज भोर करे,उससे पहले उठ जाती है, चूल्हा-चौका,भगवान को सर झुकाती है… .. देखती है […]
kavita pratiyogita
कविता प्रतियोगिता : काव्य के आदर्श शीर्षक : “वो तोड़ती पत्थर ” अपने हाथों की नाज़ुक सी कलाइयों से , हथौड़ा उठा निरंतर प्रहार करती हुई सी वो तोड़ती रही पत्थर,अविरल बस खड़ी हुई सी । यकायक नजरें पड़ी जब उसकी अपनी उस टूटे छप्पर के मकान पर साफ दिखाई दी उसके चेहरे पर चिंता की […]
वो तोड़ती पत्थर
प्रतियोगिता – काव्य के आदर्श विषय -वो तोड़ती पत्थर वो तोड़ती पत्थर, धूप में तपती हुई, हिय के छालों पर , संघर्ष को रखती हुई, नयन नहीं रोते, मगर दिल ज़ार ज़ार रोता है, हर चोट पे हथौड़े की, जैसे कोई सपना खोता है, छाले हैं भरे हाथों में, मगर वो रुकती नहीं है, जैसे […]
वो तोड़ती पत्थर
विषय – ‘ वो तोड़ती पत्थर ‘ वो तोड़ती पत्थर, मग़र खुद न टूटी, हर चोट सहती मग़र वो नहीं रूठी, छांव की आस मे धूप सी तपती, घर की रोटी खातिर जंग है रोज़ करती। हाथों मे छाले फिर भी शिकवा नहीं करती, सन्नाटो से रोज़ वो एक जंग सी लड़ती, ना पूछे कोई, […]
