तेरी बातों में आ कर रख दिया है, ले, हमने दिल जला कर रख दिया है। जहाँ पर बे-कली थी, उस जगह पर किसी ने सब्र ला कर रख दिया है। वो तेरा हिज्र है कि जिसने कमरा किताबों से सजा कर रख दिया है। तेरी तस्वीर लगनी थी जहाँ पर, वहाँ शीशा लगा कर […]
अजनबी अपने ही घर में
*अजनबी अपने ही घर में* जब तक जेब में पैसा रहा, मैं घर की शान हुआ करता था। आज हालात क्या बदल गए, अपने ही अजनबी में बदल गए। लोगों की आवाज़ बहुत काटती है, बददुआएँ भी साथ चलती हैं। फिर भी चुप हूँ, अपने काम में, शामिल हूँ ख़ुद इस अंजाम में। दर्द है […]
अजनबी अपने ही घर में
कभी की जिन दीवारों से बात, आज वो भी लगती हैं अनजान। जहाँ हँसी गूंजा करती थी, अब बस खामोशी का है सामान। क्या आज मुझसे है सभी परेशान, “अजनबी अपने ही घर में” क्यों में बन गई एक अजनबी मेहमान? अपनों की मुस्कानें जो कभी खिलती थीं, अब वो फीकी और बेमन सी लगती […]
Mazdoor
बचा लो इंसानियत वरना कुछ न बचेगा
विषय – बचा लो इंसानियत वरना कुछ न बचेगा कोने में पड़ी खाट उस पर बीमार बाप हैं मां फ़ुख रही चूल्हा अंदर करुण विलाप हैं बेटे बहू का चल रहा नित नृत्य का प्रोग्राम हैं देख दशा ऐसी विधाता भी खुद परेशान हैं पोता सोच रहा कि कब ये दुर्व्यवहार मिटेगा प्रभु बचा लो […]
दरख्त
दरख़्त
कुछ इस क़दर खड़ा हूँ मैं, कि खुशियाँ देने चला हूँ मैं, कुछ नहीं मेरा अपना जग में, बस, खुद में मस्त हूँ, दरख़्त हूँ। जब तक ज़िंदा रहा, जीवन दिया, अपनी पत्तियों के साथ, उपवन दिया, काट ही दोगे तो क्या कहूंगा ख़ुद से, बस इतना कि पस्त हूँ, दरख़्त हूँ। ना धूप से […]
मझधार में दरख़्त
“मेरी आवाज़ , मेरी पहेचान ” शीर्षक: मझधार में दरख़्त कभी थी मैं — एक दरख़्त साया-दिल, जिसकी शाख़ों में ख़्वाब झूला करते थे, जहाँ हर पत्ता एक दुआ की सदा था, हर तना — वक़्त का खामोश गवाह था। ज़मीं की गोद में मैंने रिश्तों की जड़ें बोई थीं, बच्चों की हँसी से हर […]
दरख़्त
आज़ाद परिंदे
आज़ाद परिंदे नया युग है ,अब नया आग़ाज़ होगा , बेशक! फिर नई ही कोई बात होगी । पंख लगे जो सपनों को एकबार तो , यक़ीनन मंजिल से मुलाक़ात होगी । न कोई बांध सकता है,न ही क़ैद कर पाएगा। परिंदा है वो, उड़े बिना कैसे रह पाएगा । एक उड़ान चाहिए खुले आकाश […]


